शोर-शराबे के बीच

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शोर-शराबे के बीच
नही सुनता कोई
उन आहों-कराहों को
जिनका कोई अपना सौदर्य-शास्त्र नही
जिनका कोई लिखित-मौखिक इतिहास नही
जिनके पास श्रुत-परम्परा के योग नही
जिनकी कोई गुरु-शिष्य परम्परा नही

शोर-शराबे के बीच
नही सुनता कोई
नक्कारखाने की तूतियों की आवाज़
लेकिन अब ये फुसफुसाहटें
ये आहे-कराहें दबाये न दबेंगी
क्यूंकि इन्होने तलाश लिए अपनी तरह के श्रोता
तराश लिए समानान्तर मीडिया

अपने अलमस्त शोर-शराबों में मदमस्त
इन आर्तनादों को नज़र-अंदाज़ करने वालों सावधान
ये अरण्य-रोदन और शोक-गीत
जल्द ही एक दिन छा जायेंगे
और देखना बदल देंगे ये
तुम्हारे बने-बनाये सौदर्य-शास्त्र के उपमान….

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