ग़ज़ल

कभी तो बहार बनकर मेरा मन बहलाओगे,
कभी तो झोंका बन मेरा तन सहलाओगे।
सदके में तुम्हारे क़दमों को चुम लेंगे हम,
कभी तो अपना समझ सीने से लगाओगे।।
माना कि मुकद्दर मेरा गर्दिश में है अभी पर,
कभी तो वक्त का रंगीन फलसफा दिखाओगे।
यक़ीनन कश्ती तुफानों से गुजरेगी मेरी,
कभी तो साहिल बन इसे किनारा दिखाओगे।।
ये जिन्दगी जो रेत ज्यों फिसल रही हैं अभी,
कभी तो हमराह बन मेरा साथ निभाओगे।
बहुत छुए हैं प्याले महखानों में अक्सर,
कभी तो वफा-ए-जाम अपनी नज़रों से पिलाओगे।।
अभी तो यह दूरी मजबूरी बन चुकी है पर,
कभी तो अपने आने का एक वादा निभाओगे।
मैं चलता रहा तन्हा इस बेदर्दी गुलिस्तां में,
कभी तो इन वीरानियों में एक गुलफाम खिलाओगे।।
कब तक भटकुँ यूँ यादे ले तुम्हारी,
कभी तो अपने आने का एक वादा निभाओगे।
अश्कों का सैलाब हैं इन पलकों में हमारी,
कभी तो इन नैनोँ से तुम “नैना” मिलाओगे।।
ये कारवाँ जो मौत का बढ़ रहा है मेरी,
कभी तो पल दो पल इसे ठहराओगे।
लो चुरा के लाया हूँ ये रेशम बेवफा तेरे लिए,
कभी तो इससे वफा की एक चादर सिलाओगे।।
इस बारिश में यूँ ही ग़म के दिन-रात भीगते रहे अकेले,
कभी तो एक बार अपनी जुल्फों तले छुपाओगे।
मगरूर ये जमाना ठुकरा रहा हैं अभी पर,
कभी “अनमोल”देकर सदा मुझे यूँ पास बुलाओगे।।