उसे हँसते देखा है

कुछ कर दिखाने को ठानो तो सही,
मेहनत से तक़दीर बदलते देखा है।

तू क्यों होता है बेमतलब परेशा,
हिम्मत से ज़िन्दगी सम्भलते देखा है।

तू क्यों घबराता है क़यामत के राहों में,
तूफां से लोगो को लड़ते देखा है।

जो जीता है दुसरो के लिए,
हर गम सहके, उसे हँसते देखा है।

सपने सच कर दिखाने के लिए लोगो को,
बेख़ौफ़ आसमा में उड़ान भरते देखा है।

मुश्किल चाहे कितनी भी हो ज़िन्दगी में,
उसे कड़ी टक्कर देते देखा है।

न कर घमंड कभी किसी चीज पे,
ख़्वाब की महल भी ढहते देखा है।

न रोक कदम तू आगे बढ़ते रह,
हारते हुए को भी जीतते देखा है।

मंज़िल की राहों में कितनी भी हो कांटे,
बे धड़क राही को चलते देखा है।

जो मानव जाति हर धर्म से प्यार करते है,
उन्हें नफरत की नकाब फेकते देखा है।

जो समाज देश की कल्याण चाहते है,
उन्हें मोह,अंह छल-कपट को बेचते देखा है।

जिन्होंने ठान लिया गलत राह नहीं चलना है,
उन्हें सत्य की राह में मुड़ते देखा है।

असत्य कितने भी शक्तिशाली क्यों न हो,
उन्हें सत्य के आगे झुकते देखा है।

@@ दुष्यंत पटेल @@