राजतंत्र

(१)
अन्याय की कीमत अब आवाम जानती है, घोटालों की हक़ीक़त हर आँख पहचानती है |
ये कालचर्क कि परिणिति है मेरे दोस्तों , अब राजनीति भी सुनहरा परिवर्तन मांगती है ||

(२)
मैं इतिहास के पन्नो में लिखा भारत नहीं जानता,
मैं शब्दों की गरिमा और अभिवयक्ति नहीं जानता |
प्रश्नो के आईने में खुद को मौन पाया है मैंने,
मैं वंशवाद का बीज हूँ, मैं सुशासित राजनीति की वर्णमाला नहीं जानता ||

(३) “एक भ्रष्ट नेता की वाणी ”
जब पूछा जायेगा क्यूँ बेचा है देश को तुमने, क्या गले से तुम्हारे निवाला जायेगा ,
कहा मैंने “मैं भूखा हूँ सत्ता का , हाँ ख़ुशी से मेरे निवाला जायेगा ” |
क्या होगा अगर कोई पूछ ले देश का सौदागर है तू, यही ईमान है तेरा ,
कहा मैंने ” मैं नेता हूँ भष्ट, यही ईमान है मेरा” ||

(४)
चुनावी माहौल में सिक रही है सियासी रोटियॉ,
बट रहे है ख़ज़ाने, बट रही है जातियां |
सत्ता का मोह ही ऐसा है , बदल जाते है रंग ईमान के ,
नींद से जागो अब तो , क्यूँ बंद पड़े है चक्षु ज्ञान के ||

(५)
संसद की आज आत्मा बिलख – बिलख के रोई है , वोटो की राजनीति से गरिमा इसने खोई है |
हर पल मिटती अस्मिता, कालिख बनके छाई है, गौरवमय इतिहास की रेखा हमने ही मिटाई है ||
क्यूँ चुने है ऐसा निकृष्ट नेता जो अपमान सदन का करते है |
हटधर्मी और निर्लजता का बरबस दम भरते है ||
क्या समझे इसे सिर्फ अखाडा या फिर कुरुवंश की सभा |
निवस्त्र की जा रही लोकतंत्र की द्रोपदी जहाँ ||
हमने ही बोये है कांटे फिर फूल कहाँ से पाएंगे |
अब नहीं जागे तो विश्व में और शर्मसार हो जायेंगे ||

(६)
मैं आम आदमी हूँ मुझे सत्ता का लोभ नहीं,
मैंने अपना पद छोड़ा है इसका मुझको छोभ नहीं |
पर जनता का फिर विश्वास अधर में लटका है,
राजतंत्र के हाथो ने आशाओं को पटका है ||
माना ये कीचड़ है सत्ता का , फिर भी कमल वही खिलता है,
खुद से लड़ कर जीते जो , उसको ही यश मिलता है |
समय कम था मुद्दे बहुत , कुछ तो पहले कर जाते,
लोकपाल मिल जाता फिर , कुछ और मुश्किलें हल कर जाते ||
दुनिया में काले है बहुत , सब पर न अभी संधान करो |
रोटी-कपडा-मकान मिले हर जरूरतमंद को, पहले ऐसा विधान करो ||

(७)
जोड़-काट के खेल में खिल रहे है सत्ता के फूल, दल अपना बदल रहे छोड़ अपने राजनैतिक मूल |
देखो ये कैसा दृश्य यहाँ बिक जाते है गिरगिट ईमान में , सत्ता के झंडे बदल जाते है लोकतंत्र के अपमान में ||
तोड़ो-जोड़ो की नीति यहाँ पर किसने वफादारी निभायी है, सेकी है वादो की रोटी और झूठ में मिलाकर खायी है |
गला काट की दौड़ में बस गधों की गिनती पायी है , इस बार वोट मिले उसी को जिसने सत्ता की साख बनाई है ||

(८)
तू चोर-वो चोर-ये चोर-सब चोर, ये आलाप अब छोडो सब |
चुनावी अखाड़े का बिगुल बज चुका, कमर तुम कसोगे कब ||
दोषारोपण करते रहना और खुद निकम्मे बने रहना, ये कैसी कर्मठता है |
बिना कर्म के कहाँ जगत में, फल किसे यूँ मिलता है ||
माना कि दोष जहां में बहुत है , मगर ऐ दोस्त दूर तो उनको करना पड़ता है |
सिर्फ दहाड़ने से शेर शिकारी नही होता , शिकार के लिए तो उसको भी दौड़ना पड़ता है ||

—- कवि कौशिक

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