एकांत

चलते-चलते अचानक मन मे विचार आता है ,
क्यों लोगो का ये कारवां मुझसे आगे निकल जाता है ।
मैं देखता हुँ उस कारवें को वो मुझसे नजरे चुराता हैं ,
मन मैं दुख तो होता हैं कि दोस्त कोई खास हमारा भी होता ,
जिसके मन मे कोई लोभ ना कोई लालच होता ।
सादगी वाणी मे विचारो मे आधुनिकता होती ,
जिन्दगी को जीने का एक नया मकसद मिल जाता ,
दिल की हर बात उस सच्चे दोस्त को बताता ।
फिर मन का दुसरा हिस्सा प्रश्न उठाता है ,
क्यों तुँ एक लालची को अपना दोस्त बनाता है ,
जिन्दगी जीने के लिये दोस्त इतना भी जरूरी नही है ,
मजिंल पर पहले पहुचंता है जो अकेले चलता है ,
क्योकिं अकेले चलने वाला ही तेज चलता है ।
यह बात मन को जच जाती है ,
क्योकिं हर रात के बाद सुबह आती है ,और
अतःपटल का प्रश्नवाचक पुर्णविराम मे बदल जाता है ।।