न जाने क्यों

न जाने क्यों आज फिर कुछ अंधेरा सा लगता है
आँखें खुली है मगर सब धुंधला सा लगता है ।

साँस लेता हूँ यहाँ पे, चलता फिरता हूँ यहाँ पे
ठोकर लगती है तो संभलता हूँ यहाँ पे
आजाद हूँ फिर भी, बंद सा एहसास क्यों लगता है ?

सब साथ हैं फिर भी दिल अकेला सा है
कुछ बात नहीं फिर भी मन परेशान सा है
बातें करना भी चुप रहने सा लगता है
क्या चाहता हूँ जिंदगी से, सब ख़्वाब सा लगता है ।

बीतीं बातें भी अब हंसाती नहीं
जो पास थे उनकी भी याद आती नहीं
सही गलत सब एक सा लगता है
न जाने क्यों आज फिर कुछ अंधेरा सा लगता है ।

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