शतरंज की सी चाल-गजल-शिवचरण दास

शतरंज की सी चाल उलझती हुई मिली
हर शख्स की नकाब उतरती हुई मिली.

दोस्तों की भीड में अपना कोई न था
जो भी मिली निगाह बदलती हुई मिली.

मन्जिल बहुत करीब आकर ना मिल सकी
पैरों तले जमीन ही खिसकती हुई मिली.

यह हादसा हुआ है अपने ही साथ क्यूंकर
जितनी छुपाई बात हर उभरती हुई मिली.

रातों की चांदनी भी करती कमाल है
एक बर्फ की शिला भी उबलती हुई मिली.

तपती हुई दोपहर में झुलसा किये सभी
और रात हर उदास ठिठुरती हुई मिली.

एक कली के बाग में खिलने की देर थी
कि दास हरेक राह महकती हुई मिली.

जितना किया तसव्वर हमने तो आपका
उतनी ही ज्यादा आग दहकती हुई मिली.

शिवचरण दास

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