नदी किनारे

जब चल रहे थे उस रोज़ हम-तुम नदी किनारे..
उन लिपटी हुयी हथेलियों के बीचों-बीच
पनपने लगे थे ख्वाब कई सारे

जब चल रहे थे उस रोज़, हम-तुम नदी किनारे..
उस तन्हाई में भी थे आस-पास
कई गवाह उस मरासिम के,
डूबते हुए सूरज की लालिमा भी,
और पिघलते हुए बादल की स्याही भी…

जब चल रहे थे उस रोज़, हम-तुम नदी किनारे..
खुश होकर बिखेर रही थी रात अपनी चांदनी,
घुल रही थी मचलते लम्हों में चाशनी धीरे-धीरे,
मिलता-जुलता था उस रात का चेहरा मेरे दुपट्टे से,
वहां ऊपर तारे टिमटिमा रहे थे,
यहाँ नीचे जुगनू जगमगा रहे थे…

जब चल रहे थे उस रोज़, हम-तुम नदी किनारे..

4 Comments

  1. roshan soni roshan soni 18/02/2015
  2. निशान्त पन्त "निशु" निशान्त पन्त "निशु" 20/02/2015
  3. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Anuj Tiwari"Indwar" 10/09/2015
  4. Nanda 28/01/2016

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