नारी एक नज़रिया

नारी एक नज़रिया
जीवन को समझने का ज़रिया
पर दुर्भाग्य हमारी, जो अर्धांग्नी कहलाये
उसे हम आज तक समझ ना पाये
जबसे हुई तेरी प्रस्तुति
करते आये सभी स्तुति
आदि-काल से पूजी जाति
फिर भी तू दूसी जाति
शून्य को आकार दिया
पराये सपनो को साकार किया
बहुमुखी क्षेत्रों में काम महान किया
हर रिश्ते का सम्मान किया
हर रूप में प्यार दिया
तो कभी चंडी बन
पापी का नाश किया
फिरभी तू अबला है, बेचारी है
दुर्भाग्य का दंश झेलती नारी है
नज़रें जो कोई तुझपे बुरी आती
कीमत भी उसकी तू ही चुकाती
कदम-कदम पे अग्नि परीक्षा है
कोई न पूछे तेरी क्या इच्छा है
बंधनो में बंधी, सहन में सधी
कर्तव्यों के दलदली में जीवन भर धंसी
पंख होते तो परवाज़ कर जाती
पर दुर्भाग्य कोशिश से पहले ही
‘पर’ तेरी क़तर दी जाती.

* मो. जुनैद अह्मद *

One Response

  1. Rahul 04/04/2015

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