अधर्मी धर्म के आलय।

इंसानियत तब रो रही थी खून के आंसू,
जब वो मंदिर के सामने भूखा बैठा था,
उस पत्थर की मूरत को चढ़े थे पकवान कई,
और उस लाचार के होंठो पे सूखा बैठा था।

उस कंटीली ठण्ड में वो ठिठुर के मर रहा था,
उसी मस्ज़िद के सामने जहाँ कोई इबादत कर रहा था,
मरे हुए की मज़ार पे फ़ैली थीं कई चादरें,
और वो लाचार अपने तन को पत्तों से ढक रहा था।

उस गिरजे के सामने वाली झोपड़ी में,
सूरज की रोशनी भी आने से शरमाती है,
अँधेरे में जी रहा है उस झोपड़ी का परिवार न जाने कब से,
और सारी जनता उस गिरजे में रोज लाखों मोमबत्तियां जलाती है।

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