आज जाके देख लो

आंसू बहाना व्यर्थ है तो क्या रक्त बहाना है सही,
बारूद के गोलों से भी शांति मिलती है कहीं,
युद्ध तो लाखों हुए हैं और विजेता भी कई,
आज जाके देख लो, अशांति मिलेगी वहीँ।

लाख कोशिशों के बाद भी, हम सुधर न पाये हैं क्यूँ,
जब मुस्कान से भी काम हो, बन्दूक हम उठाये हैं क्यूँ,
रक्त रंजित श्वेत वस्त्रों की लगी भरमार है,
आज जाके देख लो, दुखी सारा संसार है।

घोर हिंसा, दिग्भ्रमित जनता, और कोलाहल यहाँ,
हर घड़ी पी रही, है मानवता हलाहल यहाँ,
कष्ट की है न कोई कमी फिर भी लगी है होड़ क्यूँ,
आज जाके देख लो, व्यथित हर परिवार है।

कहते हैं वो हमसे की वो शांति के दूत हैं,
विश्व शांति लाने को उनके इरादे मज़बूत हैं,
हमको तो उनका समर्पण लगता बेमानी है अब,
आज जाके देख लो, गाय चर्म में वो सियार धूर्त हैं।

आज तो कह दिया हमने, कल शायद न कह पायेंगे,
ये हमारे शब्द भी कहीं भीड़ में गुम जाएंगे,
शायद कल आके देखो तो, सूरत बदल गयी हो,
एक दूसरे में परस्पर, प्रेम और सहभाग है।

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