“अलि -अली मचलती “


मंगल हुसैन का दिल ,कविताऍ गढ़ रहा है |
हुसैन अमीर गाजी ,पंक्तियाँ हिन्दी पढ़ रहा है ||
थपेड़े आंधियों के ,सह दीपक जलता रहा है |
हसरतों में कोई चितेरा ,कल तलक ढल रह है ||
यूँ हमें देखते वे ,अलि -अली मचलती रही हैं ||
हम परजो छा गया नशा, दुआ वह देता ही रहा हैं |
बुलंदियों की आवाज ! आलोचना झेलता रहा हैं ||
अहे! खुफिया नराज भारत ,कमांडो रिहर्सल करते रहे |
चढ़ रहे पक्षी तो परवान ,जाती बाद अरमान गढ़ रहे ||
तिनके जेब में माया घेरे,वर्फ पिघते पाषाण जल रहे |
झुरमुट सघन ओझल अंध ,में गूगल टटोलते मिले |
इसरो इन्सान अंतरिक्ष भेजें ,जी !राधाकृष्णन कह रहे ||
काशी धन्य हैं मंगल मोदी ,मंगल मंगल मनन भार हरो |
वज्रंगी ताकत बतलाए ,शिक्षा सुधार कर जनन दुःख हरो||

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