रोशनी दायरों में सिमटती रही–शिवचरण दास

रोशनी दायरों में सिमटती रही
और हंसी वायदों में उलझती रही.
कैद ख्वाबों को मुठ्ठी में कर ना सके
जिन्दगी हर कदम पर फिसलती रही.

मेरे आका ने किस्मत मेरी नोचं ली
मेरे आका ने अस्मत मेरी नोचं ली.
बस लुटेरों को अपना चमन सौंपकर
एक मां लाडली को डपटती रही.

चूंस कर भवरां उड गया फूल को
फिर भी आतुर हैं कलियां सिन्दूर को
करके तनमन समर्पण स्वतः प्यार में
लाजवन्ती क्लिनीक मे भटकती रही.

दास जिनकी शराफत का यह शोर है
वो अन्धेरों का सबसे बडा चोर है.
जिनको हमने हमेशा मसीहा कहा
उनकी बन्दूक हम पर ही चलती रही.

शिवचरण दास

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