आखिरी पड़ाव

मेरी परिस्थिति है बड़ी विकट
अंतिम घड़ी है निकट
क्या मैं सुनाऊँ अपनी कहानी
हरी-भरी थी मेरी जवानी
कभी था कोमल बचपन
बड़ा सुखी था मेरा जीवन
कण-कण में था उमंग
स्नेह भरा था अंग-अंग
इस उम्र से आगे बढ़ा ज़रा
उम्मीदों पे उतरा खरा
शक्तिशाली हुई मेरी भुजाएं
हाथों से मैंने अमृत लुटाए
तब मैं बहारों का शहज़ादा कहलाया
जीवन के कितने काम आया
जब तक हरियाली थी
जीवन में खुशहाली थी
जहाँ जीवन का लगता था मेला
आज मैं क्यों रह गया अकेला
तन-मन की शक्ति क्षीण पड़ी
हर किसी से दूरी बढ़ी
जिस क्षत्रछाया ने सींचा कई जीवन
ठिठुरन और तपन से तड़प रहा वो तन
बची-खुची जो साँस है
उसपर लोभियों की आस है
मैं व्यथित किसे व्यथा सुनाऊँ
कहीं बिन एक बूँद के न मर जाऊँ
ज्ञान है मुझको माटी की प्रकृति का
विसृत होती अपनी स्थिति का
पर एक अभिलाषा है
माटी में अवश्य मिल जाऊँ
मर के भी जीवन के काम आऊँ
जीवन सार मुझे यही सिखाती
जीवन सदा समान कहाँ रह पाती
उत्कृष्ठ्य अस्तित्व भी एक दिन मिट जाती

* मो. जुनैद अह्मद *

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