झरोखा

जब कभी देखता हूँ यादो के झरोखो से
बहुत कुछ बिखरा हुआ नजर आता है
पीछे पड़ा हुआ है एक ढेर, टूटे हुए सपनो का
बीच में कुछ हसीं पलो का मंजर नजर आता है !!

उम्र गुजारी है सारी किन किन हालातो मैं
लेखा जोखा कुछ उलझा सा नजर आता है
फिर भी कही कुछ तो था जीवन में ऐसा सार
जिसके साये में जीवन संवरा नजर आता है !!

वैसे तो रफ़्तार बहुत तेज है साँसों की
पीछे मुड़कर देखने का वक़्त कहा आता है
कुछ कदमो के निशां फिर भी ऐसे होते है
जिनका साया साथ चलता नजर आता है !!

जीवन में ठोकरे कुछ ऐसी भी खायी हमने
जिनका जख्म अभी तक हरा नजर आता है
दोष क्या दे किसी को अपनी गलतियों का
हर तरफ ये फलसफा उसी का नजर आता है !!

हो लग्न अगर किसी को पाने की मीरा जैसी
जिनको जहर के प्याले में कृष्णा नजर आता है
झुकते है भगवान भी अपने सच्चे भक्त के आगे
यु तो हर कोई मंदिर में पूजा करता नजर आता है !!

ढूंढ़ लेते है कर्मशील समुन्द्र में भी मोती को
कर्महीन को तो हर जगह पत्थर नजर आता है
बैठा रहा जो भरोसे, किस्मत को दोष देता रहा
जीवन में “धरम” उसे कहाँ प्रकाश नजर आता है !!

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डी. के. निवातियाँ___________@@@

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