“तेरा ही हूँ”

“तेरा ही हूँ”

कुछ ख़ास है कुछ विश्वास है |
तेरा मेरा नाता ऐसा , प्रेम के घरोंदे जैसा वास है ||
जीवन को जीवन , मकां को घर बनाया तूने |
मैं को हम और हम को अपना बनाया तूने ||
प्यार को परिभाषा दी तूने, गृहस्ती की अभिलाषा दी तूने |
एक अकेलेपन को मेरे , प्यार की आशा दी तूने ||
क्या बयां करूँ तुझे, मेरी आँखों में पड़ लेना |
जो भी झलकेगा नैनो से, बस अपने लिए ही समझ लेना ||
एहसास है अपना ये, कुछ रीत ऐसी ही बनी होगी |
यूँ ही ऐसे न मिलते हम , ये जोड़ी ही ऊपर बनी होगी ||
और क्या दूँ तुझे जन्मदिन पर, क्या अनोखा तुझे दूँ |
तेरा हो चुका मैं , और तेरा ही हूँ ||

2 Comments

  1. Sukhmangal Singh sukhmangal 03/01/2015
    • कवि अर्पित कौशिक 04/01/2015

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