धड़कन बन्द है

तू बनकर मशीहा
हालात बैठा रहे
बेगैरत ज़माना
परवाह नहीं करता

मारते तो हैं लोग
तकरीरें खंजर से
जालीम हैं बस कोई
दफन ही नहीं करता

मैं रोऊँ भी तो जाकर
किस से कहूँ यहां
लिहाज़ अब लिहाफ का
कोई भी नहीं करता

सुना है असर होता है
हर कोशिश का यहां
पर दौरे कशिश है कि
ख़त्म ही नहीं होता

सासें भी लेता हूँ
तो भी गिन गिनकर
धड़कन बन्द है पर
कोई मुर्दा नहीं कहता

2 Comments

  1. कवि अर्पित कौशिक 02/01/2015
    • rakesh kumar rakesh kumar 23/01/2015

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