ये लोग ही हैं

मारते नहीं हैं लोग
हालात पैदा करते हैं
बेबश को घर से
निकाल बाहर करते है

दुआ सलाम होती है
सिर्फ जगहं देखकर
मौक़ा मिलते ही तुमपर
लोग सवाल करते हैं

फुलाते हैं सीना जो
थोड़ी सी हवा मिली
मूछों के लिए ,बड़े से
बड़ा बवाल करते हैं

मुस्कुराते भी हैं तो
दबे दबे ,पीठ पीछे
या फिर खुलकर
ओरों पर ही हशते हैं

मौत का मातम हो
या हो दहशत के दाग
दूसरों के दर्द पर लोग
दबा दबाकर लिखते हैं

देखते हैं जी भरकर
तमाशा नंगेपन का
दूसरों की इज्जत्त का लोग
अच्छा मज़ाक करते हैं

नहीं देखा राकेश ने
कभी खुदा का सितम
ये लोग ही हैं जो,वक़्त को
इतना कठोर करते हैं

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