नुर जरा निखरा नही

आँख से अरमाँ भी सदियो से उतरा नही
कत्ल हो हररोज पर खून का कतरा नही
मुर्दो की तरह जिता हु सवारकर तकदिर
जलता हु रोज पर मौत का खतरा नही

माहोल जिंदगी का बरसो से सुधरा नही
प्यार का खुद पर एतबार भी ठहरा नही
तलवारोसे मिलती है हुकुमते जहा रोज
वही मै टूटता रहा बस बिखरा नही

स्वर्ण सा चमकालू ऐसा कोई फतरा नही
कभी बुध्द भी मेरे सासोंसे गुजरा नही
गीरा वही जो जीवन का है अंधा कुऑ
आग मे पकालु अभी नूर जरा निखरा नही.

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