राह दिखती है

सासो मे आती-जाती बसाती है कोई
पल भर जीने की राह दिखती है कोई

तस्वीर आखो मे उतारती है कोई
याद भी फिर से उभारती है कोई
तकदिर है साये से जुदा होना यहा
फिर बाग़ मे खुशीया बिखेरती है कोई

तारो के कारवा से बुलाती है कोई
फिर प्यार से दिल संवारती है कोई
मजबुरी है मुहब्बत मे जख्मी होना
फिर वादो से अपने मुकरती है कोई

नैनो के बादलो मे चमकती कोई
एहसास दिल मे फिर जगाती कोई
हलचल जरा भी गवारा न उसे
पलको से ओझल हो जाती है कोई

खुमारी मे यादो को भुलाती है कोई
ध्यान का रस मुझे दिलाती है कोई
आसक्ती विरक्ती से तोडे जो नाता
अनासक्ती मुझको पीलाती है कोई

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