नया साल

फिर दिन वहीं, फिर सुबह वहीं
फिर हर रात अन्धयारी छाती है l
फिर नये साल आते ही क्यों
इतनी धूम मचाई जाती है ll

सोच न बदली,नियत न बदली
झलकपट यूँ ही चलता जाता है l
नये साल के आते ही सिर्फ
कैलेंडर बदला जाता है ll

नये साल के नाम पर जहाँ
जश्न में लाखों रुपया उड़ाते है l
वहीं कड़ाके की सर्दी में बिन चादर
गरीब अपनी जान गवांते है ll

नये साल पर तरह-तरह के
संकलप लिए जाते है किन्तु l
दो-चार दिन बीतते ही सब
पुरानी रंगत में लोट आते है ll

हर दिन है खूबसूरत हर सुबह
नई सोच ले कर आती है l
घृणा,दुएष की भावना दूर कर
दूसरों की मदद के लिए आगे बढ़े
तो हर सुबह हमें नये साल
की ओर ले कर जाती है ll

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  1. Sukhmangal Singh SUKHMANGAL 01/01/2015

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