अद्वितय प्रेम

बड़ा छुपा के रखा सब से
तुं मिला तुं खो भी गया मुझ से
अब आँसुओं को छुपा के और हंसा नहीं जाता
अब रोज चाँद का मुझ पर हसना सहा नहीं जाता
कहीं बबुल के पीले फूल
कहीं नीला आसमान
कहीं नाकाम महोबत की आँखो में झलकती ख्वाहीशे
अब रूलाये गी मुझ को

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