निशारंभ

मैं गुलशन में जाकर देख आया वो बदरंग रहता है
बहारे तेरे बगेर आती नहीं
रात देखा रात को छुपकर अंधेरे में रोते हुए
कृष्ण पक्ष को चाँद नजर आता नहीं
सुबह रोज मुझे ख्वाहीसे बेहाल सी रोती हुई दरवाजे पड़ी मिलती है
सुबह का सूरज रोशनी की किरण भी लाता नहीं
मेरी उमीद टुट सी रही है अब
बहुत दिन हो गये तुं आया नहीं
गौ धुली उड़ने लगी
सब अपने घर को लोटे
तूं भी आजा प्रिय निशारम्भ हुई

Leave a Reply