रोते रोते पल पल मैने, इस जीवन को जिया है

रोते रोते पल पल मैने, इस जीवन को जिया है
अमृत है यारो जग ये फिर भी, मैने विष को ही पीया है
जग के सीने में आह नही थी
मुझमे जीने की चाह नही थी
फिर भी यारो तू सच मानो
मैने जीवन को जिया है
ठोकर खा के मैं बढ़ता चला
काँटों के path. पे चलता चला
सिने से निकलती आगों से
जीवन का चूल्हा जलता चला
तानों की बौछारों के .आगे
जीवन पथ पे चलता चला
महसूस नही तुमको यारो
मैं कैसे पग पे बढ़ता चला
मासूम जिंदगी सबकी है मैं भी मासूम सा बच्चा था
मैं भी सौकीन था बचपन का, मैं भी लड़का एक अच्छा था
पर बचपन बीता मेरा रोने मे
जी भर के रोया माँ को खोने मे
अफ़सोश देख के होता है
गर कोई माँ रोती घर के कोने में
ए के आनंद

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