देर आई पर दुरुस्त आई

आख़िर मेरी बरसों की चाहत रंग लाई
देर आई पर दुरुस्त आई
बचपन से एक ख्वाब था
ये ख्वाब भी लाजवाब था
चाहत मन में हो तो ज़रूर पूरी होती है
माना की जीवन में बहुत मजबूरी होती है
क्या हुआ ये देर से आई
देर आई दुरुस्त आई
बीस बरसों से पैसा जोड़ जोड़
अपने अरमानों के लिए जो उगाही
आज वो मेहनत वाक़ई रंग लाई
आज बिश्वास हो गया
जो दिल से चाहो वो पूरा हो जाता है
मंज़िल ज़रूर मिलती है गर इंसान राहों मे खो जाता है
a k anand

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