काहे का समाज है

न कल सम था न आज सम है
फिर काहे का समाज है
मुझसे किसी ने कहने को नहीं कहा
मैंने जो सहा वही कहा
देख दलित के प्रति घृणा भाव
ये आनंद के अंदर की आवाज है
की न कल सम था न आज सम है
फिर काहे का समाज है
एक अनाथ बिलखता रोते रहता
पल पल है वो ताने सुनता
आभाव सहित जीवन जी जी कर
याचक निगाहों से समाज से कहता
मेरे ऊपर के जुल्म तू कैसे सहता
तुम मूक ,बधिर और कायर हो
यह आनंद के अंदर की आवाज है
की न कल सम था न आज सम है
फिर काहे का समाज है
जिस माँ-बाप ने पाल- पोस के बड़ा किया
इसी समाज में उनपे होता अत्याचार है
बेटे -बहु हैं जश्न मानते ,
बुद्धा -बूढी का भूखा हाल है
देख चलन इस समाज का
आनंद का आगाज है
की न कल सम था न आज सम है
फिर काहे का समाज है

अभय कुमार आनंद

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