अपनी मार्किट के हालात

अपनी मार्किट के हालात हैं ऐसे
भटक गया कोई रास्ता हो जैसे
ग्राहक कभी जब आता ऐसे
एहसान उससे ले रखा हो जैसे

भाव सुनकर बिदकते ऐसे
बिजली का झटका लगा हो जैसे
उधार लेने की तमन्ना रखें
दुकानदार को ठग ही समझें

इतना महंगा बोलकर घूरें ऐसे
की सारी जायदाद उनकी लेली हो जैसे
खूब तिलमिलाएं शोर मचाएं
पर हम भी जेब से कैसे लगाएं

हमारे भी खर्चे हैं
हमारे भी बच्चे हैं
बोलकर ये परेशान करें
न जाने कैसे ये व्यवहार करें

अब नहीं आयेंगे
बोलकर इतरायें ऐसे
की दुकानदार उन्हें
मुफ्त में देदे जैसे

जी रहे हैं भ्रम के अन्धकार में
ऐसी महंगाई के जंजाल में
की कुछ तो सस्ता मिल जाए
तब कुछ जिंदगी का मज़ा आए

अपनी मार्किट के हालात हैं ऐसे
जिसमें घूमें मुसाफिर ऐसे
सेल लगी हो दुकान में जैसे
इसको ठग लूँ मैं कैसे

अपनी मार्किट के हालात हैं ऐसे
वीराने मैं आदमी भटकते जैसे
परिंदा भी आने मैं घबराए ऐसे
किसी के छीन लिए हों प्राण जैसे

कुछ तो दुकानदार बैठे मक्खी मारें
या फिर खेलें शतरंज की बाजी
कैसे भी समय व्यतीत करें
ग्राहक दिखे तो बोले हाँ जी

ऐसा सन्नाटा देख कर
दिमाग है झन्नाता
और भविष्य इसका
अंधकार में है दिखता

दिखता नहीं उजाला कुछ
ये तो भ्रम का उजाला है
कहूँ मैं तुमसे अब क्या कुछ
ये तो अंधकार का राजा है

कभी जगमगाती रौशनी है
तो कभी अमावश की है रात
कभी मार्किट अपनी अनोखी है
तो कभी ग्राहक हैं अपने ख़ास

ग्राहकों की संख्या इतनी कम है
उसमें भी कुछ सुपर बम हैं
कुछ तो इतने फुस्सी हैं
जिनको लगती इतनी महँगी है

अपनी मार्किट तो ऐसी है
जिसमें दिखते हैं कई रंग
ग्राहक आए तो दुनिया ऐसी है
जिसमें बिखरे हैं कई रंग

देवेश दीक्षित
9582932268

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