आसूओं की आवाज़

क्या कसूर था मेरा,
गोलियों से भून दिया,
शिक्षा के मंदिर में
बेगुनाहों का खून किया।
सजाकर भेजा था,
लाडले को अपने
टूट गए उनके,
जो देखे थे सपने।
दरिंदगी देख तेरी
रूहे हैं कांपी
आंचल किया सूना,
बिछड़े है साथी।
बुद्धदिल कहे इसे
या नामर्दी कहे
खून के तो हैं आसूं बहे।
दिल पसीजा नही
तेरा ओ रे दरिंदे,
न है इंसानियत तुझमें
न ही इंसान है,
इंसान के तू भेष में
जानवर हैवान है।
ख्याल नही आया तुझे,
अपनी बीबी बच्चों का।
रक्त तो बहा है वहां,
मासूम प्यारे बच्चों का।
हैवनियत देख तेरी,
सहमा है पूरा विश्व
बददुआओं से तो होगा
कुत्तों की मौत जैसा हश्र।
कुर्बानी नही जाएगी बेकार,
इतना तो तू जान ले,
आसूओं की आवाज़ को,
गौर से पहचान ले।

रवि श्रीवास्तव
email- ravi21dec1987@gmail.com

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