सौदाई

बहुत जल्दी में हम बाज़ार से निकले
बहुत जल्दी में हमने सौदाई की
न रूके न देखा बस समझा किए
इसने मोहब्बत नहीं की उसने दगाई की
समंदर को चाहिए थे शकूर के मोती
सूरज के साथ मिलकर तुमने हरजाई की
पूछो अपने दिल से अलगाव के कारण
कब वादा निभाया कब वफाई की
करते हैं हवाओं में वो बदलाव की बात
पर अपने ही घर की कब सफाई की
क्रांति का दम भरने वालों ने
सड़क पर आकर कब लड़ाई की
ये गुफ्तगूं आप से नहीं खुद से है
पंकज ने अपनी गज़ल में बस यही नवाई की

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