“जिनगी बनाईं”

जग्गू के माई कहलीं, जवानी बेकार हो गई! हमरा जिनगी तो सुना,देखबा लाचार हो गई॥ भरलय अन्न घरवा में,बबुआ बेकार हो गई? रात-दिन सुबह-साम घरहीं,बढ़ ललकार हो गई॥ सुना हमरे घर मुर्गा दारू,कै इ व्यापार हो गई! जग्गू! पापा पापी का,बतकही गुलजार हो गई॥ दैव जानें काहे हमरो?,देखबा प्यार हो गई! जनता जनार्दन जड़ाऊ,जँगला निवार हो गई॥ जना‌व जनार्दन जंगी जिद्दी,काहें भतार हो गइल। अँगना में दिनवें हमारे,सुना अनिहार हो गइल॥ केसे कहीं कैसे कहीं बचपनवें बेकार हो गई! हियरा सपनवाँ लरिकइयैं,जवनियाँ लचार हो गई॥ जियरा जे जबरी जाने,खबरी प्यार हो गई! जानी जो प्यारी पड़ोसन,फफ्ती अधिकार हो गई॥ लरिकन के संवारे बदे,बाबू जी के डाट पड़ि गई! अपने श्रृंगार खातिर,दैव-दैव कोही गई॥ छो़ड़ा चलीं सरजू तीरे,मन!माई को ही मनाईं। विलप-विलप सोई भरोस,भटकैया उहाँ भटकाईं। कुछ धरम-करम करके,शेष आपन जिनगी बनाईं॥
शव्दार्थ:-जड़ाऊ-जिसपर नग रत्न आदि जड़े हों।जँगला-कटहरा,जंगले की छड़ आदि। जंगी-लड़ाई से सम्बन्ध रखने वाला। जनाब-वड़ों को आदर देने वाला शव्द। भतार-पति,खसम। कोही-क्रोधकरने वाला। विलप-रोना,बिलपना। भटकैया-भटकाने वाला। उहां-वहाँ।

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