गले का फंदा

आज भी जिस्म में
आश बड़ी बाकी है
इन बेआवाज़ क़दमों नें
गर्त बहुत फांकी है

तड़पती हुई आरजू है
या कोई जेहनी वहम्
ये हालात मैंने बनाये
हैं या वक़्त के सितम

बेपरवाह है इरादे
नादान दिखती दिशाएँ
कटपुतली बन नाचती
सासों की बंद हवाएँ

कुढ़ता रहता हूँ मैं
अकेला रातों में
उलझा लिपटा पड़ा हूँ
सड़े गले जज्बातों में

पर कुछ तो है जो
मुझे ज़िंदा रखता है
आज अच्छा होना ही
गले का फंदा लगता है

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