खतों का खजाना

तेरे खतों का ऐसा भी
क्या नशा मुझे
देखता रहूँ बस और
पढता जाऊं तुझे

सलवटों में लिपटे
शब्द बड़े रसभरे
कुछ अहसास तेरे
खामोश से डरे डरे

मन भी मेरा हो चला
शायद बहुत दिवाना
रूठ जाता है सुनकर
तेरा खत ना आना

तेरा देखकर वो मुझे
कदम डगमगाना
झुका हुआ चेहरा ,उफ़
हया से लाल हो जाना

बेवजह बार बार तेरा
राहों में मेरी आ जाना
रुख़्सत हुआ दौर वो
रह गया खतों का खजाना

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