मैं कुछ और नहीं मंगता

बड़ा ही जिद्दी है
परवरदिगार मेरा
वो समझ लेता है
जिसे मैं नहीं कहता

कितना भी घूमूँ मैं
गफ्लति के दौर में
वो साथ चलता है
कदम पीछे नहीं करता

शुक्रिया भी करूँ तो
किन शब्दों में, मालिक
शब्द तेरी रहमतों पर
कोई खरा नहीं उतरता

खुशियाँ भी देता है तो
तो दामन भर भर कर
अंधा मन जो हीरे को
पत्त्थर नहीं समझता

बहुत से बेबश हैं
जो चल नहीं सकते
तेरी चौखट पर आता रहूँ
मैं कुछ और नहीं मंगता

Leave a Reply