बना चुके कंकाल तुम

बिफर पड़े वो मेरे
एक सवाल पर
क्या कहते हो भाई
इस भूखे निढाल पर

तुम तो हर रोज़
चन्दन से नहाते हो
कुत्तों को भी अपने
विदेशी बिस्किट खिलाते हो

कया कारण है तुम्हारे
गाल फूल गए हैं
जाने कितने बेगुन्हा
फांसी पर झूल गए हैं

खुद तो खाते हो
पीढ़ियों का जोड़ते हो
लाते हो भिखराव
जन मानस तो तोड़ते हो

कुछ तो शर्म करो
भारत माँ के लाल तुम
क्या हड्डियां भी खा जाओगे
बना चुके कंकाल तुम

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