मोहब्बत मुकमल होती कहाँ है!!

इस ज़ालिम ज़माने में, मोहब्बत मुक़म्मल होती कहाँ है!
कटतीं हैं रातें अक्सर, करवटों के साये में,
कि तेरे ख़्वाबों में खोई, सरगोशियाँ सोतीं कहाँ हैं!

अब तो सुकूं भी दस्तक, देती नहीं तसव्वुर पे,
कि इस बेजार रूह को, तेरी पनाह मिलती कहाँ है!
इस ज़ालिम ज़माने में, मोहब्बत मुकमल होती कहाँ है!!
-श्रेया आनंद
(22nd Nov, 2014)

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