यूँ तन्हा जीने की..

एक अरसा बिताया है मैंने,
तेरी यादों के सहारे,
अब और यूँ तन्हा जीने की ,
हसरत नहीं है !

कभी कोई शिकायत न की,
न कभी की नफरत तुझ से,
तेरा हर सितम सर-आँखों पर
इश्क में अब,
उल्फत यही है !

बावरी हूँ तेरी मोहब्बत में,
दिन-रात मैं तुझपे मरती हूँ,
हर दुआ में रब से तुझे मांगना,
इस दिल की तो अब,
आदत यही है !

-श्रेया आनन्द
(30th Sept 2013)

Leave a Reply