आग के बीच हथेली-गजल-शिवचरण दास

आग के बीच हथेली है समझ लेना है
जिन्दगी एक पहेली है समझ लेना है.

हाथ में न्याय के हन्टर है हजारों उनके
पीठ अपनी ही अकेली है समझ लेना है.

छिप के बैठी है गुनाहों मे खुशी की दुल्हन
दर्द ही अपनी सहेली है समझ लेना है

पी रहा है वो हमारा ही लहू अब हरदम
जुर्म के हाथ मे थैली है समझ लेना है.

वक्त है मूक बधिर ये तो गलतफहमी है
इसकी नजरें भी विषैली हैं समझ लेना है.

तन तो बाजार में मिल जायेगें चाहो जितने
मन गजल एक नवेली है समझ लेना है.

रूठ जाती है मेरी रूह भी अक्सर मुझसे
मन मेरा उजडी हवेली है समझ लेना है.

दास जब हमको हो इन्तजार नई सुबह का
रात उतनी ही घनी फैली है समझ लेना है.

शिवचरण दास

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