प्राणधारण (मुक्तक)

अंत क्या अनंत क्या है सर्व विदित
उलझा सर्वज्ञ प्राणी फिर भी किंचित
क्या यही नीति है इस प्राणधारण की
सिमटा इस रण प्रलय में हो निहित

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