न टूटा कोई पाणी

टूटा टूटा पत्थर, न टूटा कोई पाणी
खूंटा खूंटा बदतर, छूटा वो नूरानी
लपट लपट जल जाता है, जो होता है अधूरा
पूरा पूरा बुझता है, अपूरा वो वीरानी
बाती बाती संकर कर जो होता है विराट
माटी माटी उसकी खुशबू होती नहीं पूरानी
फूटी फूटी कौडी का ही जीसने लाग लगाया
बीता बीता जीता वो, न आयी जाग चुरानी

रचनाकार/कवि~ रविकार भारशंकर

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