तुझे उठाने की

जो तेवर ना दिखाऊँ
मैं बात बाकी पर
कोई लूटने में बिलकुल
शर्म ही नहीं करता

सदियों से बैठा हूँ लेकर
चिराग मरघट में
फानूस तो डालते हैं
कोई दफ़न नहीं करता

पाता हूँ अकेला
ग़ुरबत के दौर में
मेरी तकलीफों की कोई
मरहम ही नहीं करता

आते हैं तो देखते है
सजावट मेरे घर की
बातें मेरे जेहन की
कोई भी नहीं करता

लिखता भी हूँ तो
लुभाने के लिए बस
असलियत लिखने का
मन भी तो नहीं करता

अब भी दौर बाकी है
मुझे शुपुर्द खाक करने को
‘राकेश’ तुझे उठाने की कोई
जहमत ही नहीं करता

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