पाँव तो जलते हैं

कुदरत का बनाया एक
नायाब नगीना हूँ
कभी रोता नहीं
कभी शोक नहीं करता

अंजुमन में मेरे
उम्मीदों का लावा है
कोई छू नहीं सकता
कोई रोक नहीं सकता

मुक्क़द्दर में लिखा है
अकेले चलना ही
कभी रुक नहीं सकता
कभी बहक नहीं सकता

आदि हूँ नशे का
बड़े जूनून तक
लड़खड़ाता जरूर हूँ
पर गिर नहीं सकता

गाड़ते हैं कीलें लोग
ऊँचे झरोखों में
में गर्दिशों में पला हूँ
कभी बिखर नहीं सकता

थोड़ी सी रोशनाई
चाहिए होती है
मैं दरिया लिखता हूँ
पर आंशू नहीं टपकता

तन्हाई से नाता
बड़ा ही गहरा है
हर जगह मिलती है
जहां दोस्त नहीं मिलता

शोलों पर चलने का
पुराना आदि है
पाँव तो जलते हैं पर
रूहे ‘राकेश’ नहीं जलता

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