सीख रहा हूँ जीने का फ़न

सीख रहा हूँ जीने का फ़न,

जिन्दा रहना ही जीना नहीं ये जान गया हूँ,
अपनी है पहचान बनानी, मान गया हूँ,
राह सुझानी अपनी भी और दूजों कि भी,
यही एक आदत है निभानी, जान गया हूँ|

कभी कोई जब सोता है, यूँ भूखे पेट,
अपने तन को फटी हुई चादर में समेट,
मेरा भी तब मन दुखता है जाने क्यूं,
उन लाचारों कि है भूख मिटानी जान गया हूँ|

कभी कोई जब है ठिठुरता थण्ड में कहीं,
न अलाव, न ही कम्बल, सर पे छत भी नहीं,
मैं भी तब सिहर जाता हूँ देख के उन्हें,
उनके लिए भी छत है बनानी, जान गया हूँ|

कभी कहीं नवजात हैं रोते, बिलखते भूख से,
दूध नहीं नसीब है उनके, माँ के नयन मूक से,
सूखे होंठों को नहीं नसीब है एक बूँद भी,
श्वेत क्रांति है उन तक लानी, जान गया हूँ|

सीख रहा हूँ जीने का फ़न|

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