कुरुक्षेत्र

जीवन से लड़ते-लड़ते
बीत चुके हैं
कई रोज़, महीने साल
थक हार गया हूँ मैं
ख़त्म हो चुके हैं
मेरे तरकश के सारे तीर
टूट चुकी है तलवार
अपना अंतिम भाला भी फेंक चुका हूँ
जीवन की ओर

अभिमन्यु के मानिंद
उठा लिया है
रथ का पहिया
चुनौतियों से लड़ने के लिए

क्षत-विक्षत हो चुका है
मेरा कवच
और लहू के धारे बह रहे हैं
मेरे बदन के घावों से

ऐसे में सोच रहा हूँ
कहाँ है वो कृष्ण
जिसने मेरी पीठ को थपथपाकर
जीवन के कुरुक्षेत्र में कूद जाने का उपदेश दिया था।

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