भटक गए थे जो……….

भटक गए थे जो……….
रचना :- अवधेश कुमार मिश्र रजत

भटक गए थे जो उनको पुनः घर वापस ले आओगे।
कुलघाती जो घर भीतर हैं उनको कब समझाओगे।।

हर वर्ष दहन रावण करते प्रति वर्ष मनाते दीवाली,
पर क्यॅू अबभी मिट ना पाई रात पाप की वो काली।
युद्ध क्षेत्र कुरूक्षेत्र बना पर अधर्म अभी तक होता है,
अपनों से ही हो ब्यथित अब ये धर्म सनातन रोता है।
छिपे विभिषण से घर अपना कहो कब मुक्त कराओगे।…………………

वो अपने थे तो क्यॅू गए जब चले गए तो जाने भी दो,
कायर थे भयभीत हुए अब दुःख उनको सहने भी दो।
जो हैं उनकी सोचो आगे बढ़ उनका ही विकास करो,
शिक्षा भोजन रोजगार उन्हें दो सच्चा कोई प्रयास करो।
दरिद्रता में जो बिलख रहे कब हृदय से उन्हें लगाओगे।…………………

गौरवशाली जो त्याग संस्कृति परसभ्यता को अपनाते हैं,
देवालय का पथ त्याग जो मदिरालय में शीश नवाते हैं।
अपने देवों से आस जिन्हें ना वो पूज रहे जो मजारों को,
समझो क्यॅू रहा विश्वास नहीं स्वदेवों पर इन प्यारों को।
सत्य सनानत धर्म से कब खुद को अवगत तुम कराओगे।………………..

बेच रहे पाखण्डी प्रतिदिन धर्म अब नया ब्यापार हुआ,
स्वंयभू धूर्तों का ऐसा जग में अद्भूत प्रचार प्रसार हुआ।
क्यॅू मौन साध लेते हो तुम क्यॅू प्रतिरोध से घबराते हो,
धर्म की रक्षा का प्रण ले क्यॅू ना तब तुम आगे आते हो।
रजत का है प्रश्न यही आखिर कब तुम इनसे टकराओगे।………………..

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