इक धूल जमी थी आँखों पर……….

इक धूल जमी थी आँखों पर……….
रचना :- अवधेश कुमार मिश्र रजत

इक धूल जमी थी आँखों पर,
इक झटके में ही छट वो गई।
शामिल थे कल गम में जिनके,
अब वो पीर पराई सी हो गई।।

मासूमों की कब्रों पर शम्मा हमने जलाई थी,
रोये थे संग उनके हर चोट अपनी भुलाई थी।
खड़े हुए साथ उनके जब अपनों ने रूलाया था,
देख मंजरे दहशत आँखों में लहू उतर आया था।
सकते में थे हमसब भी उसदम,
दुर्घटना आखिर ये कैसी हो गई।।

सूखी ना कब्र की मिट्टी शुरू सियासी खेल हुआ,
पाकिस्तानी शासन का पुनः शुरू अठखेल हुआ।
दहशतगर्दी का अब हमको वो तो फर्क बताते हैं,
ढाया कहर जिन्होने हमपर मुक्त उन्हें करवाते हैं।
बदली उनकी भाषा और कस्में,
मानवता शायद फिरसे सो गई।।

दुश्मन से अपने लड़ने को सक्षम हैं हम हर रण में,
फिक्र करो मुल्क की अपने बारूद भरा कण कण में।
बोया जो तुमने काटो उसको फसल पक तैयार हुई,
चख लहू भेड़िये की अब सिरत पहले से खुखांर हुई।
ऐसे आदमखोरों से भिड़ने की,
आदत सी रजत अपनी हो गई।।

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  1. rakesh kumar rakesh kumar 23/12/2014

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