उलझनो की किताब-गजल-शिवचरण दास

उलझनों की किताब लगते हैं
सारे चेहरे नकाब लगते हैं.

चाक दामन हुआ तो पहचाना
अब तो कांटे गुलाब लगते हैं.

आपको क्या गरज है पीने की
आप खुद ही शराब लगते हैं.

ये हमारी कमी है कि हम ही
अब तो सबको खराब लगते हैं.

दे गया जब से कोई सपने हमें
रंग सब लाजवाब लगते हैं.

दास डरता हूं आइने से मैं
इसके तेवर खराब लगते हैं.

शिवचरण दास

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