‘नव मकरंद ‘


जस छकी लकी नवधा नवल ,छिपा -छिपी बितावत कल|
तन तरु छबि हरषत हहरत ,जुगल नहि` छाड़त लाल||
साम बचावत छोहड़ी, छाड़त नाहिं भौरा जिंद |
ताऊ बदन सदन को , लागि लगे नवधा मलिंद ||
रखिहौं दोनौं लाज साज सजोए,मरजाद दिखै समान सयानी|
धीरता गंभीत्ता वीरता दामिनी , कुशल कामना कमनीय कामिनी |
सुचिता-रीत-प्रीती-परतीति कामनी , चातुरी – चोखी – चारुता चॉदनी|
चोरी चित – चकोरी नहिं चिंतित , चंलता चौगुनी चारुता सौगुनी|
दोऊ धीर गभीरता निशानी ,मंगल मनोहर छबि ना मनमानी |
बिलसैं दोऊ विहसैं ज्यो` सागर,सुमुख सकल सरि ता बिनु गागर |
लखि अवनि अघाय आन -बान ज्यों,गिरी बिपुल छबि चाँद लसि चांदनी |

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