हम डरने वाले नही आतंक के प्रहार से

अरे सुनता है आतंक के आका
या सुनाउ मैं तुझे अपनी कलम की धार से
तुम नही बच पाएगा मेरी कलम के वार से
और हम डरने वाले नही तेरे आतंक के प्रहार से
किसी के कलेजे के टुकड़े पर गोलियों की बौछार करने वाले
कैसे मुह दिखाएगा परवर्दीगार से
मासूमों ने क्या बिगाड़ा था ए जालिम, जो सुनहरे पनपते उपवन को उजाड़ डाला
हथियार से
तेरी हरकत इंसानी किसी कोने से नही लगती
तुम लगते हो भेरिए बीमार से
तेरा कोई धर्म नही है, ना है तेरा कोई मज़हब
तुम अल्ला के बंदे हो नही सकते
मासूमों पे कहर ढाहणे वाले
तेरा कोई वास्ता नही परवर्दीगार से
मुल्क़ की माएँ रोई, मुल्क़ का कोना कोना रोया
मातम के कहर को देख विश्व का हर सक्श रोया
पिता का अरमान रोया, दादा के बुढ़ापे का सपना रोया
ना जाने कितने घरों ने घर का चिराग खोया
ए आतंक के आका ये तूने कैसा बीज बोया
आज से तू भी रोएगा, जिस कदर सारा जग रोया
मूल्यान्कन कर तेरा ए बेरहम कातिल क्या खोया , तूने क्या पाया
अबे किस मज़हब का है तू ज़रा बता बिस्तर से
बेमझहब, बेरहम कायर कातिल
शर्म नही आई निहत्थे लाशों के दीदार से
अरे मासूम दया की भीख माँगते रहे
और तूने दी उन मासूमों को मौतें कतार से
कैसा दिल है तेरा ए बेरहम कातिल
तू क्या रहनुमा बनेगा किसी इंसान का
जो धड़का नही मासूम बच्चों के प्यार से

ए के आनंद

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