जीवन पे कलंक

जीवन पे कलंक

आतंकके प्यादे मौत जगाते
बात बात पर जुर्म करते
लोग डरते, होस गंवाते
ज़िंदा ये लाशें इन्शान खाते
सृष्टिका भार ये शैतान
मौतका साया बनकर घूमते
किसीको जीवन नहीं बक्से
धर्म,दलील सब वकवास
सिर्फ अपनी सोचते
और कुछ नहीं
आगे जो पड़ते मौत देते
नाम लेकर बढ़ावा क्यों देते
डर-डर कर डर ही मरें
जीना हो तो सब मिलें
आतंक को करें मितियांमेत
दर्द को भुलाने के लिए
इंशाफ दिलाने के लिए
जीवनको फूलने के लिए|

-राम शरण महर्जन
कीर्तिपुर, काठमांडू

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