‘भोर भये पै पधारो पिया’

नारी निर्मल मलिन मन ,बूझे बूझ सके तन|
शर्माती कुछ गाती ,सामयिक कालिख मिटाती |
महा अजय संसार चलती नफा – नुकसान बताती|
खुद अश्क छुपा आँचल लेकर कचरा हटती ||
कवच अभेद्य गुरु पूजाकर छमा कृपा समता करती |
प्रीति रीति नीति हिय हारक तारक ममता रखती ||
हिलि मिली चलि चलत जाति जाति मिलि रहती |
साज़- साज़ जाति- जाति पाति- पाति सहती ||
गोल कपोल विलोचन लोल सरोजन को गाहती|
भोर भये पै पधारो पिया प्रियतम प्रीति निहारती ||

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